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‘घर से निकलने से होती है आजादी शुरू’
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    नई दिल्ली। मात्र सात साल की उम्र में विश्व जूनियर शतरंज में नंबर दो के पायदान पर पहुंची और हरियाणा के एक छोटे से गांव में जन्म लेकर अकेले दम पूरा यूरोप घूमने वाली अनुराधा बेनीवाल का कहना है कि किसी भी समाज में महिलाओं को आजादी का मतलब है कि सबसे पहले उन्हें घर से निकलने की आजादी मिले।
अपनी यूरोप यात्रा के अनुभव को लेकर ‘‘आजादी मेरा ब्रांड’’ शीर्षक से किताब लिखने वाली अनुराधा बेनीवाल ने लंदन से दिए गए एक ईमेल साक्षात्कार में महिलाओं की आजादी के संबंध में कहा, ‘हमारे समाज में महिलाएं उस सीमा को लांघने से शर्म महसूस करती हैं, जो उनके लिए निर्धारित कर दी गयी हैं । हालांकि समाज और आर्थिक स्तर के अनुसार ये सीमा बदल गयी हैं, लेकिन अभी भी ये हदें महिलाओं के लिए हैं।’ घटते लिंगानुपात को लेकर सुर्खियों में रहने वाले हरियाणा के रोहतक जिले में गांव खेड़ी में पैदा हुई बेनीवाल कहती हैं, ‘गांव में एक लड़की के लिए उसकी दहलीज, अगर वह भाग्यशाली है, तो उसका स्कूल होती है और मेट्रो सिटी में रहने वाली लड़की के लिए यह दहलीज उसका आॅफिस है ।’ वह कहती हैं, ‘सीमाएं बदल जाती हैं, लेकिन वे हमेशा रहती हैं। पुरुषों को अक्सर घर से यह कहकर निकलते हुए सुना जा सकता है , ‘अभी आ रहा हूं जरा टहल कर’, लेकिन महिलाओं को घर से बाहर जाने के लिए कोई ठोस कारण बताना होता है।’ लड़कियों को अपनी आजादी हासिल करने के संबंध में अनुराधा संदेश देती हैं, ‘हमें कड़ी मेहनत करने की जरूरत है, नौकरी हासिल करो, अपना खुद का घर लो, गाड़ी खरीदो और अपनी शर्तो पर जिंदगी जिओ। लड़कियों को अपने सपनों के राजकुमार का इंतजार करना बंद करना होगा और अपने सपनों में खुद को राजकुमारी बनाना होगा।’
किताब में अनुराधा ने यूरोप की अपनी यात्रा के दौरान भारतीय पारंपरिक समाज में महिलाओं को जकड़ने वाली जंजीरों पर भी सवाल उठाए हैं । लंदन से पेरिस, ब्रसेल्स, एम्सटर्डम, बर्लिन, प्राग, ब्रातिस्लावा, बुडापेस्ट, म्यूनिख, इंसब्रुक और बर्न आदि की यात्रा करने वाली अनुराधा महिलाओं के लिए घुमक्कड़ी की पैरोकारी करते हुए कहती है, ‘केवल यात्रा ही एक व्यक्ति को कई मायने में कई बंधनों से मुक्त करती है।’
इस सवाल पर कि क्या एक निम्न मध्यम वर्ग से ताल्लुक रखने के कारण सामाजिक बंधनों को तोड़ना उनके लिए अधिक मुश्किल काम था, 29 वर्षीय अनुराधा कहती हैं, ‘मैंने कोई बैरियर चेतन रूप में नहीं तोड़ा। मैं अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीना चाहती हूं और जीती हूं और जब आप अपने तरीके से जीने का फैसला कर लेते हैं तो बैरियर अपने आप टूटते चले जाते हैं।’ अनुराधा के शब्दों में, ‘यह कुछ ऐसा है कि यदि आप कांच के बक्से मेंं बंद हैं और उससे बाहर निकल कर बगीचे में आते हैं तो बाहर आने की इस प्रक्रिया में कांच अपने आप टूट जाता है।’ इस सवाल पर कि खुद अनुराधा के लिए ‘आजादी’ के क्या मायने हैं, वह कहती हैं, ‘जो आप हैं, वह होना ही आजादी है। जो आप बनना चाहें, वह बन सकें, यह आजादी है।’

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