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सियासत की पिच पर ‘रन आउट’ हुए सिद्धू

 नई दिल्ली। कहा जा सकता है कि क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने नवजोत सिंह सिद्धू ‘रन आउट’ हो गए हैं। पंजाब में चौथा मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे ‘कॉमेडी शो के गुरू’ को करारा झटका लगा है। यही वजह है कि उन्होंने नाटकीय अंदाज में नई पार्टी बनाने से इनकार कर दिया है। खबर है कि अब वह एक बार फिर आम आदमी पार्टी (आप) की शरण में जा सकते हैं। हालांकि कुछ दिन पहले तक सिद्धू इसी पार्टी को पानी पी-पीकर कोस रहे थे।
पूर्व भाजपा सांसद नवजोत सिद्धू, परगट सिंह व बैंस भाइयों की पिछले दिनों आवाज-ए-पंजाब फ्रंट के गठन की घोषणा के बाद पंजाब की राजनीति में हलचल पैदा हुई थी। फ्रंट को पार्टी बनाने की बात भी कही गई थी, लेकिन बुधवार को सिद्धू के पार्टी न बनाने की घोषणा ने सबको हैरान कर दिया। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि सिद्धू का यह एक नया सियासी स्टंट है। इस घोषणा के साथ सबसे बड़ा झटका चौथा फ्रंट स्थापित करके तीनों प्रमुख दलों को टक्कर देने का सपना देखने वाले लोगों को लगा है।
ऐन वक्त पर बदला रुख
‘आप’ संयोजक पद से हटाने के बाद समानांतर ग्रुप खड़ा कर पंजाब भर में तेजी से अभियान चला रहे सुच्चा सिंह छोटेपुर द्वारा पार्टी स्थापित किए जाने की योजना भी सिद्धू की घोषणा के बाद बीच में ही लटक गई है। इस पार्टी की घोषणा बुधवार ही किए जाने का कार्यक्रम था, परंतु अब छोटेपुर ने कहा है कि अभी पार्टी बनाने के कार्य हेतु कुछ और दिन चाहिएं। नवजोत सिद्धू के फ्रंट के साथ अन्य छोटे-छोटे ग्रुपों को मिलाकर नई मजबूत पार्टी खड़ी करने का छोटेपुर का इरादा था परंतु अब नई राजनीतिक स्थिति में सब कुछ बदल जाएगा।
ऐसे हो गए हालात
राजनीतिक हलकों में चर्चे हैं कि नवजोत सिद्धू को राज्य की स्थिति की जमीनी हकीकतों का अहसास हो गया था और उम्मीद के मुताबिक उन्हें अन्य पार्टियों के नेताओं ने भी घास नहीं डाली। ऐसे हालात के चलते सिद्धू को कदम वापस खींचने पड़े हैं। अब उनके पास ‘आप’ में जाने का ही विकल्प बचा है, क्योंकि जगमीत बराड़ द्वारा ‘आप’ को बाहर से समर्थन दिए जाने के बाद उनके लिए भी पार्टी में जाए बिना गठबंधन करने का विकल्प खुला है। इससे वह बराड़ के रास्ते पर चलते दिखाई दे रहे हैं, क्योंकि सिद्धू ने बुधवार को जो बयान जारी किया है, उसमें उन्होंने कहा कि वह नहीं चाहते कि पार्टी बनने से पंजाब में अकाली दल-भाजपा गठबंधन सरकार के खिलाफ पड़ने वाले वोटों का बंटवारा हो। सिद्धू जानते हैं कि यदि ऐसा हुआ तो इसका सारा ठीकरा उनके सिर पर ही फोड़ा जाएगा।

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