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हमारे नालंदा को ‘चुरा’ लिया चीन ने

 पेईचिंग। चीन ने चोरी-चोरी, चुपके-चुपके की तर्ज पर भारत को एक मामले में पीछे छोड़ दिया है। उसके यहां नालंदा विश्वविद्यालय जैसा संस्थान बनकर तैयार हो गया है। इसी साल से इसका पहला सत्र भी शुरू हो जाएगा। बनी तो ऐसी ही योजना भारत में भी थी, लेकिन उस पर अब तक अमल ही शुरू नहीं हो सका है।
नालंदा विश्वविद्यालय की अवधारणा भारत की ही देन है। प्राचीनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय का सारी दुनिया में कोई सानी नहीं था। यह दुनिया का पहला आवासीय विश्वविद्यालय था। इसमें देश तथा विदेश से करीब दस हजार छात्र अध्ययन करते थे। इसके आगंतुकों के तौर पर गौतम बुद्ध का नाम भी लिया जाता है। इस विश्वविद्यालय के भग्नावशेष आज भी बिहार में हैं। कहा जाता है कि मुगल आक्रांता बख्तियार खिलजी ने इस विश्वविद्यालय को नष्ट करवा दिया था।
चीन ने ही सन 2006 में सुझाव दिया था कि बिहार में फिर से इस विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए। इसके बाद मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनी। इसने सन 2007 में तय किया कि ऐसा किया जाए। इसके लिए नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन सहित अन्य विद्वानों की एक समिति का भी गठन किया गया। हालांकि इस दिशा में खास प्रगति नहीं हो सकी।
इधर, चीन ने इस सुझाव को अपने यहां अमल में लाने का काम कर दिखाया है। बताया गया है कि चीन ने नानशान पहाड़ पर समुद्र की सीमा के समीप नान्हाई बुद्धिस्ट कॉलेज की स्थापना कर दी है। सितंबर से इसका पहला सत्र शुरू हो जाएगा। यह काम बेहद गोपनीय तरीके से किया गया। किसी को इसकी भनक भी नहीं लगने दी गई। हालांकि इस गोपनीयता की वजह समझ से परे है। यह बात तब सामने आई, जब बीते महीने इस संस्थान के लिए एडमिशन की प्रक्रिया आरंभ हो गई।
चीन का यह संस्थान छह सौ एकड़ से अधिक क्षेत्र में फैला है। भारत से समानता का आलम यह कि संस्थान से लगी समुद्र की तटीय जमीन को ब्रह्मा शुद्ध धरती का नाम दिया गया है। इसकी अवधारणा योग वशिष्ठ और महायान बौद्ध धर्म से काफी हद तक मिलती है। इसमें बौद्ध धर्म, तिब्बती बौद्ध धर्म, बौद्ध वास्तुकला डिजाइन और अनुसंधान संस्थान समेत 6 विभाग होंगे। यहां तीन भाषाओं पाली, तिब्बती और चीनी भाषा में पढ़ाई होगी।
हम बता दें कि भारत के नालंदा विश्वविद्यालय की खोज अलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। हालांकि यह ऐतिहासिक स्थान उस समय तक मलबे में तब्दील किया जा चुका था। कहा जाता है कि करीब सवा आठ सौ साल पहले नालंदा का संचालन होता रहा। इसे गुप्त वंश ने स्थापित किया। कालांतर में हर्षवर्द्धन और पाल सहित विदेशी शासकों ने भी इसके विकास में योगदान दिया था। पांचवीं से 12वीं शताब्दी तक बौद्ध शिक्षा केन्द्र के रूप में यह विश्व प्रसिद्ध था। इसमें करीब दो हजार शिक्षक थे।

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