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बीजेपी स्टेट्स और मीट पर हल्ला....

इसे उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिली बंपर जीत का साइड इफेक्ट्स माना जा सकता है। अब यूपी के बाद बिहार और राजस्थान में भी मीट बैन की मांग उठने लगी है। और भाजपा राज वाले, हरियाणा में तो शिवसेना के दो सौ से भी ज्यादा कार्यकर्ताओं ने यहां, केएफसी के आउटलेट समेत करीब पांच सौ से ज्यादा मीट की दुकानें नवरात्र तक के लिए बंद करवा दी। और इन दुकानदारों से ये भी कहा कि वे अब हर मंगलवार अपनी दुकानें बंद रखेंगे। उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध अवैध बुचड़खानों पर है। लेकिन क्या उत्तर प्रदेश के फैसले की आड़ में सीधे सीधे खान पान की निजता पर हमला नहीं है ये? कट्टरता का एक और चेहरा। हांलाकि इसे भी पूरी तरह से एक समुदाय विशेष के खिलाफ तानाशाही का फैसला नहीं कहा जा सकता। वजह ये है कि मांसाहार किसी समुदाय विशेष तक कभी सीमित नहीं रहा है। मुस्लिमों के मुकाबले हिन्दू भले मांसाहार का सेवन कुछ कम करते हों, लेकिन रिपोर्ट्स कहती हैं कि नॉनवेज के शौकीनों में हिन्दूओं का प्रतिशत भी तेजी से बढ़ा है।
खैर ये ना भी हो तो इस तरह के फैसलों से इन कट्टरपंथी ताकतों से निपटना वाकई जरुरी हो जाता है। क्योंकि बात खान पान की है जो कि एक बेहद संवेदनशील मसला है। असल में अवैध बुचड़खानों पर बैन और खान पान की आजादी पर रोक, इन दोनों के बीच अंतर की लकीर, बहुत छोटी सी है। उत्तर प्रदेश में अवैध ढंग से चल रहे बुचड़खाने बंद करवाए गए थे। लेकिन संदेश ये लिया गया कि सन्यासी की सरकार मीट के ही खिलाफ है। मांसाहार मुक्त प्रदेश, उत्तर प्रदेश की ये नई पहचान गढ़ दी गई। और फिर बाकी के भाजपा शाासित राज्यों में भी कट्टरपंथियों की तरफ से आवाज उठने लगी। पहले उत्तर प्रदेश और फिर झारखंड की राह पर अब बिहार और राजस्थान में भी अवैध बुचड़ खानों को बंद करने की मांग की जा रही है।
लेकिन मीट बंदी की इस होड़ के पीछे दूसरा पहलू भी है। वो पहलू जहां मीट की बंद होती दुकानों के साथ मीट के दुकानदारों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो रहा है। जयपुर में एक अप्रैल से सभी स्लाटर हाउस और मीट की वे सभी दुकानें बंद कर दी जाएंगी, जिनके पास लाइसेंस नहीं है। हांलाकि दुकानदारों की दलील है कि ना उन्हेें नया लाइसेंस दिया जा रहा है, ना पुराने लाइसेंस का नवीनीकरण किया जा रहा है। बिहार में तो भाजपा इस मुद्दे को लेकर सड़क से लेकर सदन तक आंदोलन करने की तैयारी में है। मीट की नई दुकानें ना खुलें, इसके लिए रास्ते तलाशे जा रहे हैं, मिसाल के तौर पर जयपुर में मीट की दुकान की लाइसेंस फीस एक हजार रुपए कर दी गई। जबकि 1977 से अब तक ये लाइसेंस केवल दस रुपए में बन जाता था। फिर मीट की दुकानों के लाइसेंस के लिए जो शर्तें तय की गई हैं, उनमें भी दुकानों की साफ सफाई, डीप फ्रिज जैसी शर्ते हैं जिन्हें नब्बे फीसदी मीट के दुकानदार पूरी ही नहीं कर पाते।
असल में अब वो समय है कि जब भाजपा शासित राज्यों की सरकारों को इस मामले में बहुत संजीदगी और सख्ती से पेश आना होगा। जाहिर है जहां भाजपा की सरकारें हैं, वही मीट बैन की मांग की आवाजें ज्यादा बुलंद हैं। लिहाजा, अब भाजपा की सरकारों की जवाबदारी है कि उत्तर प्रदेश में अवैध बुचड़खानों पर रोक का फैसला बाकी भाजपा शासित राज्यों तक पहुंचते-पहुंचते, खान पान के खिलाफ कट्टता और तानाशाही का फैसला ना बन जाए। फिलहाल संदेश यही जा रहा है।


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