मीडिया विशेष खबरे

लरजते-गरजते शिवराज और नंगा किसान

यह किसानों के प्रति संवेदनशील मुख्यमंत्री के असंवेदनशील प्रशासन का नया चेहरा है। अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है, जब प्रशासन की लापरवाही से बेकाबू हुए किसान आंदोलन में पुलिस की गोलियों से छह किसानों की मौत हुई थी। और अब तो टीकमगढ़ में हद ही हो गई। हिरासत में लिए गए किसान कहीं आत्महत्या नहीं कर लें, इसलिए पुलिस ने लॉकअप में भेजने से पहले किसानों के कपड़े ही उतरवा लिए। क्या गजब की सतर्कता है! अब टीकमगढ़ पुलिस की यह सतर्कता शिवराज सरकार को भारी पड़ रही है। राष्टÑीय मानवाधिकार आयोग ने इस मामले में खुद संज्ञान लेते हुए शिवराज सरकार से जवाब मांगा है।

किसानों की सरकार-मध्यप्रदेश सरकार, लगता है किसानों के लिए कुछ ज्यादा ही संवेदनशील हो गई है। किसान आखिर सरकार को लगातार कृषि कर्मण अवार्ड जो दिलवा रहे हैं। खेती लाभ का धंधा पिछले एक दशक से बन ही रहा है। किसान अगर ज्यादा उत्पादन कर दें तो सरकार अब उनके लिए क्या नहीं करती। प्याज खरीदती है, सड़ाती है लेकिन किसान को तो जीरे जैसा कुछ देती ही है या नहीं। खुद घाटा उठाती है। उसके बाद भी एक किसान है कि हरदम आंदोलन के लिए सिर पर तैयार ही खड़े हैं। तो अब इतनी चिंता भी कर ही रही है ना कि आत्महत्या करने के लिए बदनाम हो चुका किसान कहीं उसके थाने में ही आत्महत्या नहीं कर लें। इसलिए अगर किसानों को लॉकअप में रखना है तो पहले उनके कपड़े उतरवाओ।

अफसरों को, प्रशासन को उलटा लटका देने का दंभघोष करने वाले शिवराज में क्या तो अफसर और क्या पुलिस, सब जानने लगे हैं उलटा लटकाने की हकीकत। आखिर बारह साल से लरजते-गरजते मुख्यमंत्री को देख ही रहे हैं। इसलिए अब शायद कान पर जूं भी नहीं रेंगती। और इसलिए हर स्तर पर हिम्मत है, भ्रष्टाचार करने की, कमीशनखोरी करने की, किसानों को परेशान करने की, नामांतरण, बटवारे में पैसा खाने की, काम को अटकाने की। हिम्मत तो ऐसी भी है कि किसान आंदोलन के लिए पूरे देश में चर्चित मंदसौर में एक बड़ा फूड पार्क, पांच सौ करोड़ रूपए का निवेश भी नौकरशाही में अटका है। हर जिले में फूड प्रोसेसिंग यूनिट खोलने के लिए पिछले बाहर साल से जी-जान एक कर रहे और खेती को लाभ का धंधा बनाने की कसमें खाते आ रहे मुख्यमंत्री को अपने ही आश्वासनों की याद नहीं है। शायद पलटकर अफसरों से उन्होंने पूछा भी नहीं होगा कि मंदसौर के फूड पार्क में आने वाले पांच सौ करोड़ रूपए के निवेश का क्या हुआ? निवेश करने वाला बैचेन है, केन्द्र सरकार के खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय से उसे 15 अक्टूबर तक का समय मिला हुआ है लेकिन मामला मध्यप्रदेश की ही अफसरशाही ने लटका कर रख दिया है।

हालत यह है कि कलेक्टर तो दूर, मध्यप्रदेश में निवेश की इच्छा रखने वालों पर एक पटवारी ही भारी पड़ गया। पटवारी अपनी जगह, लेकिन सीनियर आईएएस अफसरों की हाई पावर कमेटी भी यहीं कर रही है। मुख्यमंत्री और उनकी सरकार किसान मेले लगाने की तैयारी कर रहे हैं। जनदर्शन यात्रा पर निकलने की तैयारी कर रहे हैं। काम तो मुंह दिखाना भारी हो जाए जैसे हैं, लेकिन सरकार के मैनेजर इन कार्यक्रमों को इतने बड़े इवेंट में बदल कर रख देंगे कि बस सारी कमियां फिर पर्दे के पीछे। आगे बस, जयजय कार ही सुनाई देना है। अब इस जय जयकार में वास्तविकताएं भला कहां सामने आ पाएंगी। यही तो इवेंट मैनेजरों में तब्दील हो चुके प्रशासन की हर सफलता का राज है। न बुरा देखो, न देखने दो, न सुनो, न सुनने दो बाकी बुरा कहने का तो सीजन आ ही गया है।