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मिलावट की फर्जी खबरें फैलाने वालां पर कार्रवाई की तैयारी

नयी दिल्ली 27 नवंबर (ब्यूरो ) खाद्य पदार्थों में मिलावट की फर्जी खबरें तथा वीडियो फैलाकर लोगां में भय पैदा करने वालां पर कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) ने पिछले कुछ समय से इस तरह के वीडियो सोशल मीडिया में आने के बाद इलेक्ट्रॅानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को पत्र लिखकर ऐसे मैसेजां को ट्रैक करने की प्रणाली विकसित करने का अनुरोध किया है ताकि दोषियां पर कानूनी कार्रवाई की जा सके।

प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी पवन अग्रवाल ने कहा ”इस तरह के दुष्प्रचार न तो आम लोगां के लिए अच्छे हैं, न खाद्य पदार्थ उद्योग के लिए। आम लोगां के स्वास्थ्य, समाज और व्यापार पर इनका दूरगामी असर हो सकता है। इस तरह की खबरें लोगां में भय का माहौल पैदा करती हैं और देश के खाद्य नियमन तंत्र में लोगां के विश्वास को कमजोर बनाती हैं।“
मीडिया को भी खाद्य पदार्थों में मिलावट और संक्रमण तथा अन्य संबंधित खबरां को छापने से पहले तथ्यां की भलीभाँति जाँच करने की सलाह देते हुये उन्हांने ”एफएसएसएआई मीडिया प्रतिष्ठानां और एजेंसियां को लिखकर कहेगा कि खाद्य संरक्षा से संबंधित खबरां के प्रकाशन से पहले उनका सावधानी पूर्वक सत्यापन करने के लिए आंतरिक व्यवस्था तैयार की जाये।“ प्राधिकरण खाद्य संरक्षा की रिपोर्टिंग में तकनीकी पक्षां को लेकर क्षमता विकास के लिए मीडिया के साथ एक कार्यशाला का भी आयोजन करेगा।

श्री अग्रवाल ने इस संदर्भ में सोशल मीडिया पर वायरल प्लास्टिक के अंडे और प्लास्टिक के चावल वाले वीडियो का जिक्र करते हुये कहा है कि ये वीडियो पूरी तरह से फर्जी हैं। साथ ही सोशल मीडिया पर दूध में मेलामाइन की उपस्थिति तथा एफएसएसएआई द्वारा दूध में इसे मिलाने की अनुमति का वीडियो भी फर्जी है। उन्हांने कहा कि देश में खाद्य पदार्थों में मेलामाइन मिलाना पूरी तरह प्रतिबंधित है और प्राधिकरण ने नियमां में कोई बदलाव नहीं किया है। हालाँकि, एक प्रदूषक के तौर पर अनजाने में दूध में आ जाने वाले मेलामाइन की अत्यंत सीमित मात्रा को अंतर्राष्ट्रीय मानकां के अनुरूप स्वीकार्य है।

एफएसएसएआई ने मीडिया में आयी उसे खबर का भी जिक्र किया गया है जिसमें विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मशविरे के हवाले से कहा गया था कि दूध और अन्य डेयरी उत्पादां में मिलावट के कारण वर्ष 2025 तक देश की 87 प्रतिशत आबादी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां की चपेट में आ जायेगी। प्राधिकरण ने स्पष्ट किया कि डब्ल्यूएचओ ने कभी ऐसा कोई मशविरा जारी नहीं किया है।