अपराध समाचार मध्य प्रदेश

प्रोफेसरों की नियुक्ति में बड़ा फर्जीवाड़ा, इन पर गिरेगी गाज

एलएन स्टार, इंदौर
प्रदेश के सरकारी कॉलेजों के लिए 2011 में मप्र लोक सेवा आयोग के जरिए प्रोफेसरों की नियुक्ति का मामला फिर गरमा गया है। नियुक्ति को गलत ठहराने की शिकायत करने वाले पंकज प्रजापति ने उच्च शिक्षा विभाग की वह नोटशीट सार्वजनिक की, जिसमें धांधली की शंका जताई थी। प्रजापति ने आरोप लगाया है, धांधली की जांच कराने के बजाय सरकार ने अपने स्तर पर लीपापोती कर दी।

मप्र लोक सेवा आयोग ने 242 प्रोफेसरों को नियुक्ति दी थी। शासन ने इनमें से 171 प्रोफेसरों को नियमित कर दिया है। आरोप है, नियुक्ति के समय ज्यादातर प्रोफेसर भर्ती शर्तों पर खरे नहीं उतर रहे थे। कुछ के पास दस वर्षों तक पढ़ाने का अनुभव नहीं था। नियुक्तियों में गड़बड़ी का मामला कोर्ट भी पहुंचा। कोर्ट के आदेश पर शासन ने जांच शुरू की थी। उच्च शिक्षा विभाग के पूर्व आयुक्त उमाकांत उमराव ने शिकायतों को सही पाया।

एसटीएफ, लोकायुक्त या ईओडब्ल्यू जांच की मांग
प्रजापति ने मंगलवार को जांच की नोटशीट की प्रति पेश की। इसमें स्पष्ट उल्लेख है, कई प्रोफेसर अर्ह्रता की शर्तें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। उन्होंने भी धांधली की आशंका जताते हुए भर्ती प्रक्रिया की जांच एसटीएफ, लोकायुक्त या फिर ईओडब्ल्यू से कराने की सिफारिश की। इस नोटशीट पर पूर्व आयुक्त के हस्ताक्षर भी है। ये नोटशीट सामने आने के बाद विभाग के अफसरों की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है। शिकायतकर्ता इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने की बात कह रहे हैं।

103 प्रोफेसरों की नियुक्ति की शिकायत
नियुक्तियों को चुनौती देने वाले प्रजापति ने 103 प्रोफेसरों की नियुक्ति नियम विरुद्ध बताई थी। इनमें इंदौर की एक महिला विधायक की बहन का नाम भी शामिल है। लेकिन, विभाग की जांच में ये आंकड़ा बढ़ गया। 103 प्रोफेसरों के अलावा भी अन्य नियुक्तियां गड़बड़ी प्रतीत हो रही हैं। प्रजापति का आरोप है, गलत तरीके से प्रोफेसर बनने वालों में ज्यादातर ऐसे रसूखदार है जो सत्तापक्ष और संघ के करीबी हैं इसलिए उन्हें बचाने के लिए निष्पक्ष जांच करने वाले अफसरों को हटा दिया। सरकार की मंशा साफ होती तो तत्कालीन आयुक्त की रिपोर्ट के आधार पर स्वतंत्र एजेंसी से नियुक्तियों की जांच कराई जाती। आरटीआई ही नहीं बल्कि सरकार विधानसभा में भी इस मामले पर जानकारी देने से बच रही है।