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अनुसंधान एवं विकास के काम में तेजी लाये डीआरडीओः सीतारमण

नयी दिल्ली, 27 नवम्बर (ब्यूरो ) रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण ने देश को रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए नवाचार पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया है और रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) से इस दिशा में तेजी से काम करने को कहा है।

देश में बौद्धिक संपदा अधिकार संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए रक्षा उत्पादन विभाग के महत्वाकांक्षी कार्यक्रम मिशन रक्षा ज्ञान शक्ति को लाँच करते हुए श्रीमती सीतारमण ने सभी संबंधित पक्षां से रक्षा क्षेत्र में नवाचार के काम को तेजी से आगे बढ़ाने तथा उन्हें व्यायसायिक दृष्टि से अमली जामा पहनाने की दिशा में काम करने को कहा। डीआरडीओ को इस मिशन के तहत बड़ी भूमिका निभाने के लिए उत्साहित करते हुए उन्हांने कहा कि बदली परिस्थितियां से उत्पन्न अवसरां तथा सरकार से मिल रहे समर्थन का फायदा उठाते हुए संगठन,” अनुसंधान और विकास पर विशेष रूप से दोबारा ध्यान दे।

 उन्हांने कहा कि डीआरडीओ को आत्मचिंतन कर नवाचार के काम में तेजी लानी चाहिए। संगठन को विचारां और कल्पना को रक्षा क्षेत्र के लिए सफल परियोजनाआें में तब्दील कर उन्हें अमली जामा पहनाना चाहिए। उसे बौद्धिक संपदा अधिकार के लिए केवल पंजीकरण की संख्या को बढ़ाकर ही संतुष्ट नहीं होना चाहिए।

श्रीमती सीतारमण ने रक्षा उत्पादन विभाग से भी कहा कि वह रक्षा क्षेत्र में नवाचार करने वाले सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनां को बढ़ावा दे और प्रक्रियागत अड़चनां को दूर करने के लिए सरल नीति बनाये। उन्हांने कहा कि रक्षा क्षेत्र के लिए नवाचार और कोई अन्य कार्य करने से लोग अक्सर हिचकिचाते हैं, विभाग को इस हिचकिचाहट को दूर कर इसे लोगां के लिए आकर्षक क्षेत्र बनाना होगा जिससे देश की रक्षा जरूरतां को पूरा करने के साथ-साथ हम दुनिया भर में निर्यातक देश का दर्जा हासिल कर सकें। इसके लिए एक विशेष सुविधा केन्द्र भी बनाया जाना चाहिए।

रक्षा सचिव उत्पादन डॅा अजय कुमार ने कहा कि भारत को रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने के लिए तकनीक हस्तांतरण पर आधारित मॅाडल को छोड़कर डिजाइन के क्षेत्र में दक्षता हासिल करनी होगी। इससे भारत रक्षा उत्पादां का केन्द्र बनने के साथ-साथ उनका निर्यात करने वाला प्रमुख देश भी बन सकेगा। उन्हांने कहा कि अभी भारत केवल तकनीक का हस्तांतरण करता है लेकिन कोई भी समस्या आने या डिजाइन में सुधार के लिए उसे दोबारा उस कंपनी की शरण में जाना पड़ता है जिससे उसने तकनीक ली है।

उन्हांने कहा कि किसी भी सौदे में उत्पाद के डिजाइन की कीमत 50 से लेकर 70 या 80 प्रतिशत तक होती है और उसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री की कीमत केवल 20 से 30 प्रतिशत ही होती है। डिजाइन के क्षेत्र में दक्षता हासिल नहीं होने के चलते भारत को रक्षा उत्पादां के लिए आयात पर ही निर्भर करना पड़ता है। उन्हांने कहा कि मिशन रक्षा ज्ञान शक्ति के तहत डिजाइन के क्षेत्र में दक्षता हासिल करने पर विशेष जोर दिया जायेगा। इस मिशन के तहत एक साल में पेटेंट के लिए 1000 आवेदन और 10 हजार लोगां को प्रशिक्षित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस मौके पर रक्षा मंत्री ने नवाचार के क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियां के वैज्ञानिकां को उत्कृष्ट कार्य के लिए प्रमाण पत्र भी दिये।